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नवंबर 20, 2017

चार लाइना

ढेरों कमियां है हम में
इस लिए
हम दूर रहते हैं 
मिलकर हमसे कहते हैं लोग
हम बड़े ही मगरूर रहते हैं। sm

अक्तूबर 01, 2017

मैं सूरज नहीं हूँ~

मैं सूरज नहीं हूँ कि ...
अपनी प्रकाश की किरणें
बिखेर दूँ |
मेरा नाम
अवश्य सूर्य का संबोधन है
पर मैं सूरज नहीं हूँ |

अगर अपने नाम का
थोड़ा भी अंश होता मुझमें
तो मैं भारत में रोशनी बिखेरती |

अँधेरे में प्रकाश फैलाती
अन्धों को रास्ता दिखाती |

अगर अंधकार बस
मार्ग भटकता कोई
तो मैं उसे
अँधेरे से निकालकर
सही रास्तें पर लाती|

मगर अफ़सोस कि ..
मैं सूरज नहीं हूँ |


||सविता मिश्रा "अक्षजा" ||

सितंबर 29, 2017

सत्य ही लिखो-

लिखो
सत्य ही लिखो !
भले ही वह
थोड़ा कड़वा हो !

सत्य कब
किसे मीठा लगा !

सुनने में भले लगे
बड़ा ही अटपटा
पर सत्य पर असत्य ही
भारी पड़ा है आज !

असत्य को
महत्व दे रहे है जो
सत्य को
कैसे बर्दाश्त कर पायेगें ?

फिर भी बेधडक हो
बिंदास लिखो आज
सहज हो
सत्य का ही उजास लिखो ।

यकीन है हमें
असत्य पर सत्य
विजयी ही होगा
भले थोड़ी देर से सही ...!.

सविता मिश्रा 'अक्षजा'

---------------------०० ---------------------

सितंबर 24, 2017

बीएचयू से छनती आती खबरों पर

😊
बन्द मुँह था खोलना नहीं, कहीं कुछ भी था हमें बोलना नहीं
पर चुप न रह सकें देर तक, दिल-दिमाग को अब तोलना नहीं |

बहुत सोचा हमने। बड़े ध्यान से सबको पढ़ा लेकिन ...

मन को अपने मना नहीं पाए
हम हाँ में हाँ मिला नहीं पाए
अराजकता का यह माहौल
हम तो बर्दाश्त कर नहीं पाए।

मन कुछ कहता रहा.....

सवाल उठाने का दिल करता है
जवाब जानने का दिल करता है
बंधन की डोर तोड़ने को है जो आतुर
उन छात्राओं को रोकने का दिल करता है।

दिल से आवाज आई हमारे....😊

सब बेटियां सदा महफूज रहें
अराजकतावाद से वह दूर रहें
जहां सिंकती हो राजनीतिक रोटियां
ऐसे दकियानूसी विचारों से सदा दूर रहें। #sm #अक्षजा

सुबह से लिखना चाह रहे थे, लेकिन लिख नहीं पाए। मन बेचैन था घटनाओं से। अभी बेटी दिवस की पोस्ट पर दिल की बात कलम तक आ गयी

सितंबर 22, 2017

"मुख रखो बन्द"


न बाबा न
हम तो नहीं कह सकते
कोई ऐसी बात
जो पहुंचाए
किसी को भी आघात।

शिक्षक तो हैं
बच्चों के भविष्य की
नींव की ईंट
सरकारों ने किया
अक्सर उनसे चीट
अव्यवस्था की पड़ी है
उनपर आज भारी मार
साबित करने पर वो तुला
सबसे असहाय है वह किरदार।

खाली पड़ी हैं कई शिक्षक सीट
पास करने की शर्त रखी है नीट
कई कच्ची ईंटें बैठाई गई हैं
तो कई लोना ही खाई हुई हैं
जिन्हें आती नहीं टीचर की स्पेलिंग
वह कर रहें टीचर-सीट की हीलिंग |

ट्यूशन का बढ़ा है कारोबार
कोचिंग-सेंटर हुए हैं गुलजार
जहाँ ठेके पर बच्चें पास किये जाते हैं
भविष्य के साथ खिलवाड़ किये जाते हैं
कैसे बने मंजिल मजबूत
जब मिलावट नींव में ही
बहुत ज्यादा मात्रा में
गहराई तक पाई गई है।

शिक्षण-संस्थाओं में लग गई है घुन
पढ़ाई का रवैया हुआ बड़ा ढुलमुल |

स्कूलों के हालात
बड़े भयावह हैं भैया
मासूम बच्चों को
मारने पर रोक क्या लगी
अब तो वहां बलात्कार
और हत्या तक होने लगी।

न बाबा न
मुख अपना हम
नहीं खोलते हैं
झूठ के खिलाफ हम
सच्चाई को नहीं बोलते हैं।

सविता मिश्रा 'अक्षजा' २१/९/2017

😷😷

सितंबर 20, 2017

भाषा की मर्यादा..मन की

ग़ुबार😊😊😊
हत्या किसी की भी हो हत्या है। अभी छः महीने में ही कई हत्याएं हुई । अब हमारी जनरल नॉलेज इतनी बढिया नहीं कि हम सारे नाम गिनाकर आपसे पूछे कि आप फला-फला पर क्यों चुप थे।
आईना निहारिये सब जरा । हम सब दोगले हैं। मुखौटा भी एक चेहरे को छुपा सकता है कई नहीं इस युग में हमारे शायद कई चेहरे हैं और सारे चेहरों के साथ जीने के शायद हम अभ्यस्त भी हो चुके हैं।
न जाने क्यों लगता है अपशब्द कहने वाले इन चार पांच साल में हुई सभी हत्याओं को हत्या नहीं मानते हैं । उन्हें उनकी हत्या, हत्या लगती है जिनकी लकीर पर वह चल रहें। या उसकी जिसका समर्थन करने से वह लोगों की नजर में सेक्यूलर साबित हों जाए। और बची हुई जो हत्याएं हुई उसमें हमारी सम्वेदना सो जाती है।

खुशियां मनाने वाले को गाली दो और जब खुद किसी की मौत पर लड्डू बाँटो तो कहो प्रसाद है। यह तो वही बात हुई कि अपने घर की शादी में आप ढोल नगाड़े बजाए तो कानों में बांसुरी बजते और पड़ोस के घर वही बजे तो कान आपके शोर से फटने लगते। आप रह रहकर सारी की सारी गालियॉ उनके हवाले कर देते।

माना हम सब विचारों से विरोधी हो सकते हैं लेकिन क्या हक है हमें किसी को बुरा कहने का वह भी सार्वजनिक। यह तो पता है कि बन्द कमरे में आप 100 मे से 90 को गाली ही देतें होंगे।
कल परसो देखे लोग कंगना रनावत को कांटो की माला पहना रहे थें। एक औरत मुहँ खोले तो आपकी जबान काली क्यों होने लगती हैं।
जागिये बंधुओं विरोध करिये पर मर्यादा कैसे भूल जाते आप।
कल की ही एक पोस्ट पर जवाब देने पर एक महान शिक्षक का मानहत हो गया। वह सब बड़ाई करने वालों का धन्यवाद देने के बजाय हमसे ही दादागीरी करने लगें। ऐसा हमने कई बार कइयों की पोस्ट पर महसूस किया है।
हमें इस बात का बड़ा अफसोस होता है कि लोग अपने मेहमान की इज्जत नहीं करतें।

कोई भी आपकी पोस्ट पर यदि कमेंट करता है और दूसरा उससे बदतमीजी करने लगे तो आपका फर्ज बनता कि आप मेजबान का मान रखे। आपका चुप रहना यह साबित करता कि आप कमेंटकर्ता की बेइज्जती पर फूल के कूप्पा हुए जा रहें। वैसे यह भी एक भारतीयता की पहचान है।
हम अपने सम्मान पर कम दूसरों के अपमान पर ज्यादा ही खुश होतें। क्या करें यही तो भारतीयता की जड़ है। और हम अपनी जड़ को त्याग थोड़े सकते हैं।
हम कमेंट इसी लिए बहुत कम करते हैं। जैसी पोस्ट आप लिखेंगे उस समय जैसा दिमाग में आएगा आदमी बोलेगा। लेकिन सामान्य जवाब पर आपके चमचे चीखने लगे तो ....😣 भाषा की मर्यादा तोड़ने लगे तो। इसलिए सबसे भला चुप। लेकिन आदमी कब तक मौन रह सकता।
आप क्या समझते हो सामने वाले को गाली नहीं आतीं यदि ऐसा समझता हैं कोई तो वह भारत को देखा ही नहीं। हम भारतवासी तो बिन बात के गाली देते। भारतीय तो कोई गाली गलौज वाली बात हो तो बिना रुके घण्टो चीख चीख कर पूरे मोहल्ले को गाली ज्ञान में पीएचडी करा सकता हैं।
किसी की हत्या पर छाती पीटीए या फिर लड्डू बांटिए लेकिन बस एक काम करिये दूसरों को अशब्द बोलकर मर्यादा की हत्या नहीं करिए। #सविता मिश्रा

जून 24, 2017

बोल ~

तुम्हारें
श्री मुख से
दो शब्द
निकले नहीं कि
मैंने कैद कर लिया
अपने हृदय उपवन में !!

अब हर रोज
दिल से निकाल
दिमाग तक लाऊँगी
फिर कंठ तक
फिर मुस्कराऊँगी
मेरे चेहरे पर
एक अलग सी
चमक बिखर जाएँगी
इसी क्रिया को
दुहराती रहूंगी

क्योंकि
अच्छी यादों को
बार-बार खाद-पानी
चाहिए ही होता है!
और तब जाके
एक दिन
तैर जायेंगी
सरसराहट सी
पूरे तनबदन में

फिर
बेकाबू हो
उड़ चलेगा
पूरा शरीर ही
हल्का-फुल्का हो
आकाश के उस पार!

फिर तुम्हारें ही
महज दो बोल
भारी कर जाएंगे
मन को

और तत्क्षण
ला पटकेंगे मुझे
धरती पर !

क्यों !
होता है न
ऐसा
 कभी कभी !

सविता मिश्रा 'अक्षजा'

---------------------०० ---------------------

जून 02, 2017

हारा मन-

तमस था घिरा
मन में
तन भी था
कमजोर थका
कैसे लड़े बुराई से
वह था ताकतवर बड़ा

उठा पटक चलती रही
तन मन के बीच
मन हारा जब
तन तो था
पहले से ही हार गया

कमजोरी का अहसास
मन को भी मार गया |

||सविता मिश्रा 'अक्षजा'||

दरार- muktak

दोगलेपन की भरमार बहुत
दुश्मनों की खरपतवार बहुत
बहुत से लोग शर्तो पर ही जीते
दरो -दीवार में हैं दरार बहुत |
@सविता मिश्रा 'अक्षजा'यूँ ही

मई 29, 2017

muktak-

बस ऐसे ही ..........
राहों से फूल चुन के कांटे बिछा देते है लोग
कदम आगे बढाओ तो जंजीरे डाल देते है लोग
जबान खोलने पर भी लगा दी है पाबंदिया यहाँ
अच्छो अच्छो की सोहबत में बिगड़ जाते है लोग| सविता मिश्रा 
'अक्षजा'

मई 28, 2017

फेसबुकी रस-

इतने !
इतने 😊
इतने गन्दे है हम कि
अच्छे लोग 🐦
पोस्ट पर आते हैं-
समझाने हमको🐰
पर हमारी ही समझ पर
लानत भेज भाग जाते हैं 😉
कहाँ?
कहाँ क्या!
कुछ ब्लाक करके
कुछ ऐसे ही उलटे पाँव
अपने घर को (वाल)!
और कहाँ!!😊
फिर??
फिर क्या !
हम भी मन मार
उन्हें महापागल कहके
संतुष्ट हो लेते।😊
और कुछ ?
कुछ तो
समझा
समझाकर 🐥
समझ के पागल हमे
चुप्पी लगा जाते हैं 
तब ?
तब क्या !
उनकी पोस्ट देखकर
हम भी कुछ
अइसने ही समझ
अनदेखा करके
चुप्पे चले आतें !👻😁
और जो
पोस्ट पर आते वो!
वो
वो क्या समझ आतें ?
राम जाने !
शायद वो
पागल हमको न माने
हम उन्हें पानी पिलाकर ही
अपनी पोस्ट से देते जाने।😊😊
और जो !
सोये पड़े वो ?
उन्हें पानी
पिला पिलाकर
मन करता है
बाहर निकालें !!
क्यों?
क्योंकि
खरबूजे को देखकर ही
खरबूजा रंग बदलता
कुछ मेरे साथ भी
ऐसा ही करतें हैं
फिर हम क्योंकर
न करें!!😛
हम आत्मियता में
फंसे रहतें😊😊
और वो
हमें आँख दिखाते!
हम बर्दाश्त
करें फिर उन्हें
यह हमारी प्रवित्ति
में कहाँ!!😊😊
दिल करता
उन्हें उनकी
औकात दिखला दे😷
भौ भौ करते जो😊
उन्हें आईना
पकड़ा दें!!
#सविता मिश्रा 'अक्षजा'
पुरानी पोस्ट में जरा #नमक लगा के👻👻👻

एक भैया के कहने पर बाद में मिर्च भी छिटके :P

मई 26, 2017

खिल उठे पलाश--mukesh dubeyभैया के 'कहानी संग्रह' की समीक्षा

नाम 'अक्षजा' रखा तो सोचा
कुछ नया सा मैं कर डालूँ

गद्य 'कहानी संग्रह' पढ़कर मैं
   पद्य सी समीक्षा ही लिख डालूँ।





गुबार नहीं है यह। दिल से निकली आवाज है। लेकिन दिल की गहराइयों से में कथाएं पोस्ट करते इस लिए इस को यहाँ ही पोस्ट करना मज़बूरी थी।..:)

कुछ मेरी कलम से---:)  

दस कहानियों में शब्दों की
हुई है सरलता से ऐसी झोकाई
जैसे की कोई जुतें हुए खेत में
बीज बो रहा हो किसान भाई।

पढ़ते-पढ़ते पढ़ डाली थी कब की सारी कहानी
समीक्षा लिखनी थी तो एक बार फिर खंगाली
हतप्रभ थी कथानक की बुनावट देखकर
खाना भी भूली जबकि रोटी रखी थी सेंककर।

मिलकर आपकी विनम्रता तो देखे थे
जाना आपको 'दो शब्द' पढ़कर 
क्या कहानियां बनायी हैं आपने
दादी- नानी के किस्से से बढ़कर।

सामने पहली कहानी थी 'फासले'
'अंशुल', 'शर्मिष्ठा' को देखकर
'शालू' होने का था भ्रम पाले
अंत बड़ा सटीक लिख दिया
'अंशुल' ने अपना दिल-हाले ।

सच्ची प्रेम की महत्ता है आपने दर्शायी
मुझमें आगे पढ़ने की लालसा जाग आयी।

दूजी कथा 'सिद्धार्थ' और 'आरोही' की 'जुगलबन्दी'
पढ़ते-बढ़ते हुई चेहरे की मुस्कान थोड़ी मन्दी
दो दिलो का प्यार टूटकर बिखर रहा था
अंत में 'सिरोही' करके भाई तुसी कमाल कर दी।

'हकीकत' में असलियत की मिली हमको झलकी
'आशिमा' की कहानी पढ़ के भुजा 'अक्षजा'की फड़की
ऐसे 'वैदिकों' की शायद साहित्य में कमी नहीं है
'अशिमाओं' को चाहिए दे 'वैदिकों' को अब पटकी।

'राज' और 'सोमी' की धीरे-धीरे बढ़ती
'सरहदे अपनी अपनी' की लवस्टोरी
पढ़ते हुए यह कथा आँखे मेरी नम हो गयी
किताब रूप में प्यार की बन्द हुई तिजोरी।

'उसके हिस्से का दर्द' शीर्षक पढ़ा तो
सोचा किसके हिस्से में होगा यह दर्द?
पढ़ते ही आज की हकीकत समझ रूह काँप गयी
शक के दानव ने दिल के रिश्ते को किया गर्त।

'यही है सहर'
पत्नी के कहर से टूट चुका था
कि अचानक 'रोहित' को मिली 'गति' शाम के पहर
'गति' ने जो उसके जीवन को दी गति
तो लगा सच में यही तो है असली सहर।

'लिबास' दिल को झकझोरने में सफल हुई
कपड़े-लत्ते पर मानवीय संवेदना भारी पड़ी
यर्थार्थ को परिलिक्षित करा गयी
'श्रेया' कर रही एहसान इस भाव पर अंत में हथौड़ी पड़ी।

'खिल उठे पलाश' में कुछ तो था ख़ास
किताब का नाम यही, तो जगी एक आस
मान्यताओं को इस कहानी में धत्ता बता दिया
'शम्पा'  से दस साल छोटे 'आवि' की शादी करा दिया।

'आंतकवादी' में 'वीरा' की कहानी
आंतक के बीच लड़ती झाँसी की रानी
प्रेमी 'करतार' आतंकवादियों की मंशा करता फेल
'वीरा को कहना उसका करतारा आंतकवादी नहीं था'
अंत के इस वाक्य ने मेरी आँखों से आँसू दिया धकेल।

अंतिम कहानी 'कॉल सेंटर और पूस की रात'
इस कहानी में हुई है युवाओं की बात
बहकते युवाओं में 'अर्पित' की जिम्मेदारी भा गयी
अंत होते-होते आधुनिक पूस की रात छा गयी।

शब्दों के खिलाड़ी ने
खूब खेल दिखाया है
हर कहानी में बड़ी खूबी से
मानवी संवेदना को भर पाया है।

देती हूँ मैं अपने शब्दों को अब यही पर विराम
"खिल उठे पलाश" को पढ़िए आप सब जल्दी हाथ में थाम।


सविता मिश्रा 'अक्षजा'
पढ़ने के बाद लिखने में कल कल होता रहा, कल जल्दी कब आता। इस लिए लिखने में बड़ी देर हो गयी। 

पर कहे थे कि लिखेंगे तो देर आये दुरुस्त आये वाले रास्ते पर चलकर दुबारा पढ़ी गयी कहानियां यह खुशी की भी बात न mukesh dubeyभैया।
बड़े हैं छोटा समझ गलती क्षमा करेंगे उम्मीद है

मई 24, 2017

माँ की रूह -

मृत्यु तो सास्वत सच है जिसे कभी टाला नहीं जा सकता
माँ की रूह को बेटी के शरीर से निकाला नहीं जा सकता |
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

मई 23, 2017

भूली नहीं हूँ-(do line)

 भूली नहीं हूँ कुछ भी मैं दिले नादान से
याद नहीं करना चाहती तुम्हें बस दिमाग से।

||सविता मिश्रा 'अक्षजा'।।

मैं सूर्य नहीं हूँ--

मैं सूर्य नहीं हूँ
सुना न तुमने,
कि मैं सूर्य नहीं हूँ !

सूर्य नहीं हूँ मैं, कि
समय से निकलूँगी और
समय पर ही डूब जाऊँगी।

ऐ बादल, कान खोलकर
जरा तू भी सुन ले कि
मैं वह सूर्य नहीं हूँ
जिसे तू अपने पीछे
छुपा लेता है।

मेरे नाम का अर्थ
भले ही सूर्य हो,
पर सूर्य नहीं हूँ मैं।

महाभारत काल का
सूर्य भी नहीं हूँ मैं कि
जिसके सामने उसके
पुत्र कर्ण का कवच कुंडल
छीन लिया जाय कपट से।

मैं सतयुग का भी
सूर्य नहीं हूँ
जिसे फल समझकर
भक्षण करने का
प्रयास किया जाय।

मैं कलयुग की सविता हूँ,
वर्तमान का सूर्य हूँ मैं,
न तेरे कहने से निकलूँगी,
न तेरे कहने पर चलूँगी,
और न तेरे कहे अनुसार
अपना आचरण करुँगी।

द्वापर युग के सूर्य की तरह
बेटे के साथ छल भी नहीं होने दूँगी
और न ही सूर्य की तरह
अपने कुरूप हुए बेटे को
अपने आप से जुदा ही करुँगी
मैं छाया हूँ उसमें जोश भरूँगी
दुनिया उसके कार्य से
उसे पहचानेगी एक दिन।

छली कपटी लोगों
सुन लो कान खोलकर
मेरे बच्चों की तरफ
गलती से भी कभी
तिरक्षी दृष्टि न करना।

मैं सूर्य नहीं हूँ,
मैं शक्तिस्वरूपा हूँ
अपने बच्चों की
'छाया' हूँ मैं।

एक माँ हूँ मैं,
एक नारी हूँ मैं
अडिग हो गई तो
सब पर भारी हूँ।

सूर्य नहीं हूँ बल्कि,
सविता हूँ मैं |
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#सविता मिश्रा #अक्षजा