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अक्तूबर 01, 2017

मैं सूरज नहीं हूँ~

मैं सूरज नहीं हूँ कि ...
अपनी प्रकाश की किरणें
बिखेर दूँ |
मेरा नाम
अवश्य सूर्य का संबोधन है
पर मैं सूरज नहीं हूँ |

अगर अपने नाम का
थोड़ा भी अंश होता मुझमें
तो मैं भारत में रोशनी बिखेरती |

अँधेरे में प्रकाश फैलाती
अन्धों को रास्ता दिखाती |

अगर अंधकार बस
मार्ग भटकता कोई
तो मैं उसे
अँधेरे से निकालकर
सही रास्तें पर लाती|

मगर अफ़सोस कि ..
मैं सूरज नहीं हूँ |


||सविता मिश्रा "अक्षजा" ||

सितंबर 29, 2017

सत्य ही लिखो-

लिखो
सत्य ही लिखो !
भले ही वह
थोड़ा कड़वा हो !

सत्य कब
किसे मीठा लगा !

सुनने में भले लगे
बड़ा ही अटपटा
पर सत्य पर असत्य ही
भारी पड़ा है आज !

असत्य को
महत्व दे रहे है जो
सत्य को
कैसे बर्दाश्त कर पायेगें ?

फिर भी बेधडक हो
बिंदास लिखो आज
सहज हो
सत्य का ही उजास लिखो ।

लिखो
सत्य ही लिखो !
भले ही वह
थोड़ा कड़वा हो !

सत्य कब
किसे मीठा लगा !

सुनने में भले लगे
बड़ा ही अटपटा
पर सत्य पर असत्य ही
भारी पड़ा है आज !

असत्य को
महत्व दे रहे है जो
सत्य को
कैसे बर्दाश्त कर पायेगें ?

फिर भी बेधडक हो
बिंदास लिखो आज
सहज हो
सत्य का ही उजास लिखो ।

यकीन है हमें
असत्य पर सत्य
विजयी ही होगा
भले थोड़ी देर से सही ...!.

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
---------------------०० ---------------------

सितंबर 24, 2017

बीएचयू से छनती आती खबरों पर

😊
बन्द मुँह था खोलना नहीं, कहीं कुछ भी था हमें बोलना नहीं
पर चुप न रह सकें देर तक, दिल-दिमाग को अब तोलना नहीं |

बहुत सोचा हमने। बड़े ध्यान से सबको पढ़ा लेकिन ...

मन को अपने मना नहीं पाए
हम हाँ में हाँ मिला नहीं पाए
अराजकता का यह माहौल
हम तो बर्दाश्त कर नहीं पाए।

मन कुछ कहता रहा.....

सवाल उठाने का दिल करता है
जवाब जानने का दिल करता है
बंधन की डोर तोड़ने को है जो आतुर
उन छात्राओं को रोकने का दिल करता है।

दिल से आवाज आई हमारे....😊

सब बेटियां सदा महफूज रहें
अराजकतावाद से वह दूर रहें
जहां सिंकती हो राजनीतिक रोटियां
ऐसे दकियानूसी विचारों से सदा दूर रहें। #sm #अक्षजा

सुबह से लिखना चाह रहे थे, लेकिन लिख नहीं पाए। मन बेचैन था घटनाओं से। अभी बेटी दिवस की पोस्ट पर दिल की बात कलम तक आ गयी

सितंबर 22, 2017

"मुख रखो बन्द"


न बाबा न
हम तो नहीं कह सकते
कोई ऐसी बात
जो पहुंचाए
किसी को भी आघात।

शिक्षक तो हैं
बच्चों के भविष्य की
नींव की ईंट
सरकारों ने किया
अक्सर उनसे चीट
अव्यवस्था की पड़ी है
उनपर आज भारी मार
साबित करने पर वो तुला
सबसे असहाय है वह किरदार।

खाली पड़ी हैं कई शिक्षक सीट
पास करने की शर्त रखी है नीट
कई कच्ची ईंटें बैठाई गई हैं
तो कई लोना ही खाई हुई हैं
जिन्हें आती नहीं टीचर की स्पेलिंग
वह कर रहें टीचर-सीट की हीलिंग |

ट्यूशन का बढ़ा है कारोबार
कोचिंग-सेंटर हुए हैं गुलजार
जहाँ ठेके पर बच्चें पास किये जाते हैं
भविष्य के साथ खिलवाड़ किये जाते हैं
कैसे बने मंजिल मजबूत
जब मिलावट नींव में ही
बहुत ज्यादा मात्रा में
गहराई तक पाई गई है।

शिक्षण-संस्थाओं में लग गई है घुन
पढ़ाई का रवैया हुआ बड़ा ढुलमुल |

स्कूलों के हालात
बड़े भयावह हैं भैया
मासूम बच्चों को
मारने पर रोक क्या लगी
अब तो वहां बलात्कार
और हत्या तक होने लगी।

न बाबा न
मुख अपना हम
नहीं खोलते हैं
झूठ के खिलाफ हम
सच्चाई को नहीं बोलते हैं।

सविता मिश्रा 'अक्षजा' २१/९/2017

😷😷

सितंबर 20, 2017

भाषा की मर्यादा..मन की

ग़ुबार😊😊😊
हत्या किसी की भी हो हत्या है। अभी छः महीने में ही कई हत्याएं हुई । अब हमारी जनरल नॉलेज इतनी बढिया नहीं कि हम सारे नाम गिनाकर आपसे पूछे कि आप फला-फला पर क्यों चुप थे।
आईना निहारिये सब जरा । हम सब दोगले हैं। मुखौटा भी एक चेहरे को छुपा सकता है कई नहीं इस युग में हमारे शायद कई चेहरे हैं और सारे चेहरों के साथ जीने के शायद हम अभ्यस्त भी हो चुके हैं।
न जाने क्यों लगता है अपशब्द कहने वाले इन चार पांच साल में हुई सभी हत्याओं को हत्या नहीं मानते हैं । उन्हें उनकी हत्या, हत्या लगती है जिनकी लकीर पर वह चल रहें। या उसकी जिसका समर्थन करने से वह लोगों की नजर में सेक्यूलर साबित हों जाए। और बची हुई जो हत्याएं हुई उसमें हमारी सम्वेदना सो जाती है।

खुशियां मनाने वाले को गाली दो और जब खुद किसी की मौत पर लड्डू बाँटो तो कहो प्रसाद है। यह तो वही बात हुई कि अपने घर की शादी में आप ढोल नगाड़े बजाए तो कानों में बांसुरी बजते और पड़ोस के घर वही बजे तो कान आपके शोर से फटने लगते। आप रह रहकर सारी की सारी गालियॉ उनके हवाले कर देते।

माना हम सब विचारों से विरोधी हो सकते हैं लेकिन क्या हक है हमें किसी को बुरा कहने का वह भी सार्वजनिक। यह तो पता है कि बन्द कमरे में आप 100 मे से 90 को गाली ही देतें होंगे।
कल परसो देखे लोग कंगना रनावत को कांटो की माला पहना रहे थें। एक औरत मुहँ खोले तो आपकी जबान काली क्यों होने लगती हैं।
जागिये बंधुओं विरोध करिये पर मर्यादा कैसे भूल जाते आप।
कल की ही एक पोस्ट पर जवाब देने पर एक महान शिक्षक का मानहत हो गया। वह सब बड़ाई करने वालों का धन्यवाद देने के बजाय हमसे ही दादागीरी करने लगें। ऐसा हमने कई बार कइयों की पोस्ट पर महसूस किया है।
हमें इस बात का बड़ा अफसोस होता है कि लोग अपने मेहमान की इज्जत नहीं करतें।

कोई भी आपकी पोस्ट पर यदि कमेंट करता है और दूसरा उससे बदतमीजी करने लगे तो आपका फर्ज बनता कि आप मेजबान का मान रखे। आपका चुप रहना यह साबित करता कि आप कमेंटकर्ता की बेइज्जती पर फूल के कूप्पा हुए जा रहें। वैसे यह भी एक भारतीयता की पहचान है।
हम अपने सम्मान पर कम दूसरों के अपमान पर ज्यादा ही खुश होतें। क्या करें यही तो भारतीयता की जड़ है। और हम अपनी जड़ को त्याग थोड़े सकते हैं।
हम कमेंट इसी लिए बहुत कम करते हैं। जैसी पोस्ट आप लिखेंगे उस समय जैसा दिमाग में आएगा आदमी बोलेगा। लेकिन सामान्य जवाब पर आपके चमचे चीखने लगे तो ....😣 भाषा की मर्यादा तोड़ने लगे तो। इसलिए सबसे भला चुप। लेकिन आदमी कब तक मौन रह सकता।
आप क्या समझते हो सामने वाले को गाली नहीं आतीं यदि ऐसा समझता हैं कोई तो वह भारत को देखा ही नहीं। हम भारतवासी तो बिन बात के गाली देते। भारतीय तो कोई गाली गलौज वाली बात हो तो बिना रुके घण्टो चीख चीख कर पूरे मोहल्ले को गाली ज्ञान में पीएचडी करा सकता हैं।
किसी की हत्या पर छाती पीटीए या फिर लड्डू बांटिए लेकिन बस एक काम करिये दूसरों को अशब्द बोलकर मर्यादा की हत्या नहीं करिए। #सविता मिश्रा

जून 24, 2017

बोल ~

तुम्हारें
श्री मुख से
दो शब्द
निकले नहीं कि
मैंने कैद कर लिया
अपने हृदय उपवन में !!

अब हर रोज
दिल से निकाल
दिमाग तक लाऊँगी
फिर कंठ तक
फिर मुस्कराऊँगी
मेरे चेहरे पर
एक अलग सी
चमक बिखर जाएँगी
इसी क्रिया को
दुहराती रहूंगी

क्योंकि
अच्छी यादों को
बार-बार खाद-पानी
चाहिए ही होता है!
और तब जाके
एक दिन
तैर जायेंगी
सरसराहट सी
पूरे तनबदन में

फिर
बेकाबू हो
उड़ चलेगा
पूरा शरीर ही
हल्का-फुल्का हो
आकाश के उस पार!

फिर तुम्हारें ही
श्री मुख से
महज दो बोल
भारी कर जायेगा
मन को

और तत्क्षण
ला पटकेगा मुझे
धरती पर !

क्यों !
होता है न
ऐसा कभी कभी !

सविता मिश्रा 'अक्षजा'

---------------------०० ---------------------

जून 02, 2017

हारा मन-

तमस था घिरा
मन में
तन भी था
कमजोर थका
कैसे लड़े बुराई से
वह था ताकतवर बड़ा

उठा पटक चलती रही
तन मन के बीच
मन हारा जब
तन तो था
पहले से ही हार गया

कमजोरी का अहसास
मन को भी मार गया |

||सविता मिश्रा 'अक्षजा'||

दरार- muktak

दोगलेपन की भरमार बहुत
दुश्मनों की खरपतवार बहुत
बहुत से लोग शर्तो पर ही जीते
दरो -दीवार में हैं दरार बहुत |
@सविता मिश्रा 'अक्षजा'यूँ ही

मई 29, 2017

muktak-

बस ऐसे ही ..........
राहों से फूल चुन के कांटे बिछा देते है लोग
कदम आगे बढाओ तो जंजीरे डाल देते है लोग
जबान खोलने पर भी लगा दी है पाबंदिया यहाँ
अच्छो अच्छो की सोहबत में बिगड़ जाते है लोग| सविता मिश्रा 
'अक्षजा'

मई 28, 2017

फेसबुकी रस-

इतने !
इतने 😊
इतने गन्दे है हम कि
अच्छे लोग 🐦
पोस्ट पर आते हैं-
समझाने हमको🐰
पर हमारी ही समझ पर
लानत भेज भाग जाते हैं 😉
कहाँ?
कहाँ क्या!
कुछ ब्लाक करके
कुछ ऐसे ही उलटे पाँव
अपने घर को (वाल)!
और कहाँ!!😊
फिर??
फिर क्या !
हम भी मन मार
उन्हें महापागल कहके
संतुष्ट हो लेते।😊
और कुछ ?
कुछ तो
समझा
समझाकर 🐥
समझ के पागल हमे
चुप्पी लगा जाते हैं 
तब ?
तब क्या !
उनकी पोस्ट देखकर
हम भी कुछ
अइसने ही समझ
अनदेखा करके
चुप्पे चले आतें !👻😁
और जो
पोस्ट पर आते वो!
वो
वो क्या समझ आतें ?
राम जाने !
शायद वो
पागल हमको न माने
हम उन्हें पानी पिलाकर ही
अपनी पोस्ट से देते जाने।😊😊
और जो !
सोये पड़े वो ?
उन्हें पानी
पिला पिलाकर
मन करता है
बाहर निकालें !!
क्यों?
क्योंकि
खरबूजे को देखकर ही
खरबूजा रंग बदलता
कुछ मेरे साथ भी
ऐसा ही करतें हैं
फिर हम क्योंकर
न करें!!😛
हम आत्मियता में
फंसे रहतें😊😊
और वो
हमें आँख दिखाते!
हम बर्दाश्त
करें फिर उन्हें
यह हमारी प्रवित्ति
में कहाँ!!😊😊
दिल करता
उन्हें उनकी
औकात दिखला दे😷
भौ भौ करते जो😊
उन्हें आईना
पकड़ा दें!!
#सविता मिश्रा 'अक्षजा'
पुरानी पोस्ट में जरा #नमक लगा के👻👻👻

एक भैया के कहने पर बाद में मिर्च भी छिटके :P

मई 26, 2017

खिल उठे पलाश--mukesh dubeyभैया के 'कहानी संग्रह' की समीक्षा

नाम 'अक्षजा' रखा तो सोचा
कुछ नया सा मैं कर डालूँ

गद्य 'कहानी संग्रह' पढ़कर मैं
   पद्य सी समीक्षा ही लिख डालूँ।





गुबार नहीं है यह। दिल से निकली आवाज है। लेकिन दिल की गहराइयों से में कथाएं पोस्ट करते इस लिए इस को यहाँ ही पोस्ट करना मज़बूरी थी।..:)

कुछ मेरी कलम से---:)  

दस कहानियों में शब्दों की
हुई है सरलता से ऐसी झोकाई
जैसे की कोई जुतें हुए खेत में
बीज बो रहा हो किसान भाई।

पढ़ते-पढ़ते पढ़ डाली थी कब की सारी कहानी
समीक्षा लिखनी थी तो एक बार फिर खंगाली
हतप्रभ थी कथानक की बुनावट देखकर
खाना भी भूली जबकि रोटी रखी थी सेंककर।

मिलकर आपकी विनम्रता तो देखे थे
जाना आपको 'दो शब्द' पढ़कर 
क्या कहानियां बनायी हैं आपने
दादी- नानी के किस्से से बढ़कर।

सामने पहली कहानी थी 'फासले'
'अंशुल', 'शर्मिष्ठा' को देखकर
'शालू' होने का था भ्रम पाले
अंत बड़ा सटीक लिख दिया
'अंशुल' ने अपना दिल-हाले ।

सच्ची प्रेम की महत्ता है आपने दर्शायी
मुझमें आगे पढ़ने की लालसा जाग आयी।

दूजी कथा 'सिद्धार्थ' और 'आरोही' की 'जुगलबन्दी'
पढ़ते-बढ़ते हुई चेहरे की मुस्कान थोड़ी मन्दी
दो दिलो का प्यार टूटकर बिखर रहा था
अंत में 'सिरोही' करके भाई तुसी कमाल कर दी।

'हकीकत' में असलियत की मिली हमको झलकी
'आशिमा' की कहानी पढ़ के भुजा 'अक्षजा'की फड़की
ऐसे 'वैदिकों' की शायद साहित्य में कमी नहीं है
'अशिमाओं' को चाहिए दे 'वैदिकों' को अब पटकी।

'राज' और 'सोमी' की धीरे-धीरे बढ़ती
'सरहदे अपनी अपनी' की लवस्टोरी
पढ़ते हुए यह कथा आँखे मेरी नम हो गयी
किताब रूप में प्यार की बन्द हुई तिजोरी।

'उसके हिस्से का दर्द' शीर्षक पढ़ा तो
सोचा किसके हिस्से में होगा यह दर्द?
पढ़ते ही आज की हकीकत समझ रूह काँप गयी
शक के दानव ने दिल के रिश्ते को किया गर्त।

'यही है सहर'
पत्नी के कहर से टूट चुका था
कि अचानक 'रोहित' को मिली 'गति' शाम के पहर
'गति' ने जो उसके जीवन को दी गति
तो लगा सच में यही तो है असली सहर।

'लिबास' दिल को झकझोरने में सफल हुई
कपड़े-लत्ते पर मानवीय संवेदना भारी पड़ी
यर्थार्थ को परिलिक्षित करा गयी
'श्रेया' कर रही एहसान इस भाव पर अंत में हथौड़ी पड़ी।

'खिल उठे पलाश' में कुछ तो था ख़ास
किताब का नाम यही, तो जगी एक आस
मान्यताओं को इस कहानी में धत्ता बता दिया
'शम्पा'  से दस साल छोटे 'आवि' की शादी करा दिया।

'आंतकवादी' में 'वीरा' की कहानी
आंतक के बीच लड़ती झाँसी की रानी
प्रेमी 'करतार' आतंकवादियों की मंशा करता फेल
'वीरा को कहना उसका करतारा आंतकवादी नहीं था'
अंत के इस वाक्य ने मेरी आँखों से आँसू दिया धकेल।

अंतिम कहानी 'कॉल सेंटर और पूस की रात'
इस कहानी में हुई है युवाओं की बात
बहकते युवाओं में 'अर्पित' की जिम्मेदारी भा गयी
अंत होते-होते आधुनिक पूस की रात छा गयी।

शब्दों के खिलाड़ी ने
खूब खेल दिखाया है
हर कहानी में बड़ी खूबी से
मानवी संवेदना को भर पाया है।

देती हूँ मैं अपने शब्दों को अब यही पर विराम
"खिल उठे पलाश" को पढ़िए आप सब जल्दी हाथ में थाम।


सविता मिश्रा 'अक्षजा'
पढ़ने के बाद लिखने में कल कल होता रहा, कल जल्दी कब आता। इस लिए लिखने में बड़ी देर हो गयी। 

पर कहे थे कि लिखेंगे तो देर आये दुरुस्त आये वाले रास्ते पर चलकर दुबारा पढ़ी गयी कहानियां यह खुशी की भी बात न mukesh dubeyभैया।
बड़े हैं छोटा समझ गलती क्षमा करेंगे उम्मीद है

मई 24, 2017

माँ की रूह -

मृत्यु तो सास्वत सच है जिसे कभी टाला नहीं जा सकता
माँ की रूह को बेटी के शरीर से निकाला नहीं जा सकता |
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

मई 23, 2017

भूली नहीं हूँ-(do line)

 भूली नहीं हूँ कुछ भी मैं दिले नादान से
याद नहीं करना चाहती तुम्हें बस दिमाग से।

||सविता मिश्रा 'अक्षजा'।।

मैं सूर्य नहीं हूँ--

मैं सूर्य नहीं हूँ
सुना न तुमने,
कि मैं सूर्य नहीं हूँ !

सूर्य नहीं हूँ मैं, कि
समय से निकलूँगी और
समय पर ही डूब जाऊँगी।

ऐ बादल, कान खोलकर
जरा तू भी सुन ले कि
मैं वह सूर्य नहीं हूँ
जिसे तू अपने पीछे
छुपा लेता है।

मेरे नाम का अर्थ
भले ही सूर्य हो,
पर सूर्य नहीं हूँ मैं।

महाभारत काल का
सूर्य भी नहीं हूँ मैं कि
जिसके सामने उसके
पुत्र कर्ण का कवच कुंडल
छीन लिया जाय कपट से।

मैं सतयुग का भी
सूर्य नहीं हूँ
जिसे फल समझकर
भक्षण करने का
प्रयास किया जाय।

मैं कलयुग की सविता हूँ,
वर्तमान का सूर्य हूँ मैं,
न तेरे कहने से निकलूँगी,
न तेरे कहने पर चलूँगी,
और न तेरे कहे अनुसार
अपना आचरण करुँगी।

द्वापर युग के सूर्य की तरह
बेटे के साथ छल भी नहीं होने दूँगी
और न ही सूर्य की तरह
अपने कुरूप हुए बेटे को
अपने आप से जुदा ही करुँगी
मैं छाया हूँ उसमें जोश भरूँगी
दुनिया उसके कार्य से
उसे पहचानेगी एक दिन।

छली कपटी लोगों
सुन लो कान खोलकर
मेरे बच्चों की तरफ
गलती से भी कभी
तिरक्षी दृष्टि न करना।

मैं सूर्य नहीं हूँ,
मैं शक्तिस्वरूपा हूँ
अपने बच्चों की
'छाया' हूँ मैं।

एक माँ हूँ मैं,
एक नारी हूँ मैं
अडिग हो गई तो
सब पर भारी हूँ।

सूर्य नहीं हूँ बल्कि,
सविता हूँ मैं |
************************

#सविता मिश्रा #अक्षजा

मई 19, 2017

निर्भया का खत अपनी माँ के नाम -

प्यारी माँ ,
सादर नमस्ते
माँ मैं यहाँ स्वर्ग लोक में बहुत खुश हूँ । यहाँ मुझको छेड़ना छोड़ो बेअदवी से भी कोई बात न करता । सब इतने अदब से पेश आते कि कभी- कभी मैं उकता जाती हूँ ! और गुज़ारिश करती हूँ कि मुझे फिर मेरे घर भेज दें, पर यहाँ के सर्वेसर्वा कहतें हैं कि अभी समय नहीं आया कि तुम्हें भारत भेजा जा सकें।
माँ जब मैंने ऐसा कई बार कहा और उनका रटा-रटाया जबाब कि 'अभी समय नहीं आया' सुनकर तो मेरे अंदर का जासूस जाग गया । बिना एक पल गवाएं मैं खबर लेने लग पड़ी , तो मैंने देखा कि मेरी सुरक्षा को लेकर ये सब कितने सतर्क हैं । ये सब कह रहें थे कि अभी ऐसा कुछ भी भारत में नहीं हुआ हैं जिससे मेरी सुरक्षा पुख़्ता हो सकें , बल्कि ये सब कह रहें हैं कि स्थिति और भी बिगड़ गयीं हैं। लोग उन्मादी हो गए हैं, अपने को कामदेव भी समझने लग गए हैं। लड़कियां छोड़ो कन्याओं को भी फ़ूल की तरह मसल दें रहें हैं। मानवता जैसे समाप्ति की ओर है। राक्षसी शक्तियाँ प्रबल हो गयी हैं। ज्यादातर मानव राक्षसी प्रभाव में आ गए हैं।

कुछ लोग जो प्रभाव से दूर थे उन्होंने मौन धारण कर लिया है। उनका मौन धारण करना और भी घातक होता जा रहा है। कुछ प्रभावित लोग डर के प्रभाव से बाहर निकलते ही हो-हल्ला करतें हैं पर फिर उन पर अंधेरा प्रभावी होने लगता है। अपनी छवि चमकाने की दूकान चलते- चलते अचानक जैसे बन्द हो जाती है। सब के सब दूसरें दिन अखबार में अपनी-अपनी तस्वीर देख खुश हो जाते हैं। माँ असल में मेरी तो किसी को न पड़ी थी और न किसी और लड़की की पड़ी है।

माँ जब तक मार्तिशक्ति नहीं जागेंगी कुछ ना हो सकेंगा। माँ तुम भी आश्वासन पाकर शांत हो गई। मैं देख रहीं हूँ, तुमने अपनी आवाज़ बुलंद न की। जानती हूँ छुटकी के कारण तुम चुप रह गयीं, पर माँ डर-डर कर जीने से तो अच्छा है मर जाओ ना शान से ।

बड़ा छलावा हैं वहां। क्योँकि यहाँ आने पर मैं सब देख पा रहीं हूँ। सब स्वस्वार्थ से एक दूजे से बंधे हैं। कोई अपनों के लिए बोलता है, कोई चुप हो जाता हैँ। माँ आखिर कब तक सब लोग, सब के लिए बोलते नजर आएंगे बिना किसी स्वार्थ के। बताओं तो माँ?

 ऊहह नहीं जानती तू भी ना। मैं भी ना, किससे पूछ रही हूँ। पर माँ एक बात सुन मेरी और मान। मातृशक्ति को जगा , सहना नहीं लड़कियों को दुष्टो से लड़ना सीखा। जब सब झुण्ड के झुण्ड एक साथ खड़ी हो जायँगी गलत के ख़िलाफ़ तो मेरी जैसी हालत न होगी माँ।

माँ बहुत दर्द दिया जिंदगी ने पर माँ अब मैं बहुत खुश हूँ। तू मेरी चिंता करके मत रोया कर। तेरे आंसू तड़प कर बहते है तो मुझे भी रोना आता है । मेरे आंसू पर यहाँ सब परेशान हो जाते हैं| पापा, भैया और छुटकी का ख्याल रखना। पापा भी छुप-छुपकर रोते हैं, उन्हें अकेला मत छोड़ा कर।
अच्छा माँ अब विदा फिर मिलूंगी, जब तू चाहेंगी ,मुझे याद कर रोएंगी तो अपने ही आसपास मुझे पाएंगी। लव यू माँ ...। 
तेरी सिर्फ तेरी 

निर्भया

मई 16, 2017

मेरी बिटिया बड़ी नाजो से पली-

मेरी बिटिया बड़ी नाजो से है पली
इतने लोगों की रसोई उससे कैसे बनी।|
सास-ननद चलाती हैं हुक्म दिनभर
बिटिया तू क्यों रहती है यूँ सहकर
करती नहीं ननद जरा सा भी काम
भाभी को वह समझती है एक गुलाम।
मेरी बिटिया बड़ी नाजो से है पली
संयुक्त परिवार में उसकी कैसे निभी।।
दिन-दिन भर वह खटती रहती
दर्द सहकर भी कभी कुछ न कहती
हाथ नाज़ुक हो गए उसके कितने ख़राब
पैरों की बिवाई वह छुपाती पहन जुराब |
मेरी बिटिया फूलों सी कोमल बड़ी
सूख के देखो कैसे अब कांटा हुई ||
रिश्तों की बांधे हाथों में हथकड़ी
हर काम को फिर भी तत्पर खड़ी
खेलने-खाने की उम्र में ब्याही गयी
ससुराल में कभी भी न सराही गयी
चैन से जीना वहां उसका हुआ हराम
क्या मज़ाल कि पल भर को मिले आराम।
मेरी बिटिया बड़ी नाजो से है पली
हर क्षण दिखे खिलखिलाती ही भली ||
कभी चेहरे पर उसके कोई भी सिकन न दिखी
विधना ने न जाने उसकी कैसी तक़दीर लिखी।।
मेरी बिटिया बड़े ही नाजो से पली
दिल देखो जीतने सबका वह चली …।।

मई 14, 2017

नर सदा तेरा आभारी है -

महिला दिवस की ढेरों शुभ कामनाएं..........

नारी तू संस्कारित नारी है 
नर सदा तेरा आभारी है 
कहें न मुख से भले ही
यह उसकी लाचारी है

अहम उसका भारी है
आत्मा तो फिर भी जानी है
नारी तू सुकोमल नारी है
नर के बीच तू जानी मानी है
दिल 
उसका सदा करता बेईमानी है
मुख बोले न उसके इसकी हैरानी है

नहीं करता तेरा गुणगान
यह उसकी नादानी है
कैसे कर दे यह कर्म वह
क्योंकि बहुत ही अभिमानी है

बोले कोई नर या ना बोले पर
नारी तू सदा नर पर भारी है
नारी तू आदरणीय नारी है
नर सदा तेरा आभारी है
नारी तू जग में सबसे प्यारी है
नर सदा तुझपर ही तारी है |


सविता मिश्रा 
'अक्षजा'

मई 09, 2017

आत्म संतोष-


सिर उनके कंधे पर रख
कह के उनसे अपने गम

लहरों की तरह 
बहने लग गये मेरे आँसू
आँसुओ में बह गये
मेरे सारे गिले-सिकवे
गिले -सिकवे कर
भूल गये हम
अपने सारे ही गम
गम भूल मिल गयी
कुछ खुशी हमें
खुशी पाकर भूल गये
स्वयं को ही हम ||#सविता

मई 07, 2017

फर्ज का दर्द -


महगें से महंगा बस्ता और
किताब-कापी हजारो में खरीदवाई !!

फिर स्कूल ड्रेस, जूतें, टाई
इस मंहगाई में तुम्हारें लिए बनवाई |

रिक्शा में तकलीफ होगी तुमको
हजारों में बस भी लगवाई !
स्कूल फ़ीस भरने में तो
नानी ही याद हमको आई |

ट्यूशन की तो पूछो नहीं
हर एक विषय लगवाते है
फिर भी तुम्हारें नंबर
इम्तहान में कम क्यों आते है?

ऊपर से रोज तुम्हें !
कुछ ना कुछ
रुपयें भी चाहिए होते है !!

परफ्यूम की बोतल भी
दस दिन में ख़त्म करते हो !
फिर भी पढ़कर जब
स्कूल से घर को आते हो
सब कुछ फेंक इधर-उधर
कुछ कहनें पर अहसान सा जताते हो |

पढ़कर जैसे हम पर ही
अहसान कर रहे हो
यह नहीं जानते मेहनत न करके
अपनी ही पैरो पर कुल्हाड़ी मार रहे हो |

मेहनत से पढ़ जब
कुछ बन जाओगें
तभी अच्छी सी
दुल्हन भी पोओगें |

हो सकता है तब यह माँ-बाप याद ना आयें तुमको
काट-काट पेट, पढाया है जिसने इतना तुमको |
'वाद- विवाद' कर, बिना हिचके यह कह जाओगें
पढ़ाकर, अहसान नहीं किया फर्ज था जो निभाया |

हमारा तो फर्ज था
हमने निभा दिया उसको
तुम ही शायद अपना फर्ज भूल गये,
याद रखना था जिसको |..सविता मिश्रा
============================================

मई 03, 2017

पुण्य-

बूढ़े बच्चे एक समान
करो सेवा उनकी बारम्बार
बूढ़ों के प्रति है अगर सम्मान 
तो बच्चों में बसते हैं भगवान |

बूढ़े-बच्चे की सेवा कर 
बढ़ाओ अपने पुन्य कर 
बूढ़ा देगा आशीर्वाद तुम्हें 
तो बच्चा देगा आदर तुम्हें |

बूढों का आदर कर 
सुकून अपार पाओगें
बच्चों में स्वयं भगवान
की झलक देख इतराओगें |

सेवा से मिले शांति 
सेवा से ही मिले भक्ति 
सेवा में ही अपार शक्ति 
सेवा से ही आती कान्ति |

सेवा करके सबका 
हो जाओ सबके मन का
पुन्य कर लो तुम इह लोक 
सवांर लो अपना परलोक |

|| सविता मिश्रा ||
अप्रैल १९८९
 —

अप्रैल 26, 2017

कुछ तो ऐसी बात हो

हम तुझसे
मुलाकात करे
कुछ तो ऐसी
बात हो
ख़ास तुझमें। sm

एक लाइन से बढ़ती गई। आगे बाद में कुछ मन ने कहा तो!😊
मिलकर
इधर उधर की
दो चार बात करे
कुछ तो ऐसी
बात हो
ख़ास तुझमें। sm

यादो में तू
घर कर जाये
रह रहकर
तू याद आये
कुछ तो ऐसी
बात हो
ख़ास तुझमें। sm

तुझसे मिलकर
मन मयूर हो उठे
कुछ तो ऐसी
बात हो 
ख़ास तुझमें।

तेरे ओरा से
चमत्कृत 
हो उठूँ मैं
कुछ तो ऐसी
बात हो 
ख़ास तुझमें।

प्रफुल्लित हो 
गुलाब सी 
खिल जाऊँ मैं
कुछ तो ऐसी
बात हो 
ख़ास तुझमें।

प्रभु तू 
उतर आये 
धरती पर
कुछ तो ऐसी
बात हो 
ख़ास  मुझमें। sm

फ़रवरी 20, 2017

अभिशाप-


दहेजवा क बात
हम का करी ओ भईया
दहेजवा से अछूता
न रहल बाटय कोई घरवा |

हर लड़की क बाप
 देथिन ई दहेजवा
न जाने कवोने जमाने से
चला आवत बा ई दहेजवा |

देहे रहलेंन
राजा जनक भी
खूब ढेर क दहेजवा
बनि गईल बाटय
समाज क अभिशपवा
अब ता ई दहेजवा |

हालत ऐसन भईल बाटय कि
जबरन लेथिन
 ई दहेजवा
लड़कियन के जलाय 

मार डालथिन
मिलय न अगर ई दहेजवा | सविता

घमंड ना करना --

करना है तो कर्म करना
घमंड न करना
आया है मुट्ठी बाँधकर
खुले हाथ ही है जाना |

फर्श से अर्श पर चढ़ा है
तू मेहनत से जैसे
विनम्रता से रख उसको
कायम तू कुछ ऐसे
क्यूँ घमंड में चूर हो
करता है अपमान किसी का
पाप की हांड़ी को क्यों भरना
करना है तो कर्म करना
घमंड न करना |

वरना देर नहीं लगती है
अर्श से फर्श पर आने में
राजा कब रंक बन जाएँ
बना रह जाएँ कब वह राजा
उस विधाता के पास लिखा है
इसका लेखा-जोखा ताज़ा-ताज़ा |

किसी की नजरों में नहीं चढ़ना
करना है तो कर्म करना
घमंड न करना |

तेरे कर्म ही तो करते हैं
ये सब कुछ निर्धारित
चल अब सबसे ही
गले मिल त्वरित
प्यार से बाँहों की माला डालना
करना है तो कर्म करना
घमंड न करना |

मान दे दूजे को
इस जग को तू जीत लेगा
अपमान किया किसी का तो
बद्दुआ ही तुझको मिलेगा
कभी किसी का दिल नहीं दुखाना
करना है तो कर्म करना
घमंड न करना |

सम्मान देकर तू और भी
ज्यादा निखर जायेगा
किस्मत चमकेगी और
तेरा परलोक भी सुधर जायेगा
उड़ती हुई पतंग की डोर पकड़े रहना
करना है तो कर्म करना
घमंड कभी न करना ||...

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
---------------------०० ---------------------

फ़रवरी 13, 2017

गर्व होना चाहिए-


============

नारी क्यों ढाल बने नर की
उसे तो भाल बनना चाहिए

उसको ढाल बनाये जो नर
उसका नहीं इस्तकबाल होना चाहिए

पुरुषो की अहमी सोच को
हमेशा किनारे रखना चाहिए

नर दिखाए जो तेवर तो
नहीं निराश होना चाहिए

दुर्गा चंडी नारी का ही रूप है
उसे यह अहसास होना चाहिए

दरिंदो के मन में हो खौफ पैदा
ऐसा आत्मविश्वास होना चाहिए

कदम से कदम मिला चल रही
दंभ नहीं स्वयं पर गर्व होना चाहिए

 क्यों हमेशा नारी ही ढाल बने नर की
इन्सां रूप में उसका भी एहतराम होना चाहिए | सविता मिश्रा

फ़रवरी 12, 2017

हायकु

अभाव नहीं
सब नियंत्रण में
घटना घटी |....सविता


प्रेम का भाव
समझ के पराये
हुए अपने |..सविता मिश्रा

नियत साफ़
आशीष फलता है
बड़ों का तभी |...सविता मिश्रा

यादें बिखरी
कभी हंसी या गम
जब भी आई |  .
..सविता मिश्रा


रोना रुलाना
कंधे पड़ते कम
रिश्तों का मोह |
...सविता मिश्रा


रुलाता रिश्ता
कंधे छूटते राह
प्रगति ऐसी |
...सविता मिश्रा

तुम्हारे बिन-

तुम्हारे बिन-

सुनो !
तुम्हारे बलिष्ठ
सीने पर
सिर रखकर
जो सुकून मिलता था
वह इन मुलायम सी
तकियों में कहाँ
तुम्हारे बिन!

सुनो !
तुम्हारे बलशाली
बाहों का हार
गले में पड़कर
फूल सा लगता था
पर देखो न
यह हल्का-फुल्कासुगन्धित
गुलाबों का हार भी
बड़ा भारी सा
लग रहा है
आज मुझे
तुम्हारे बिन!

सुनो !
तुम्हारी वो
कठोर भाषा
और
सख्त लहजे में
बोल
ने का अंदाज भी
बांसुरी से बजाते थे
कानो में मेरे

आजकल
बच्चों की भी
प्यारी सी
तोतली भाषा
वो रस न
हीं घोल पाते
मेरे कानों मेंतुम्हारी तरह
तुम्हारे बिन!

सुनो !
सुन रहे हो न
याद आती बहुत
आजकल तुम्हारी
सपने में भी तुम
जागती आँखों में भी
तुम ही तुम !

सुन रहे हो न
आजकल मैं
आईने के सामने
होकर खड़ी
निहारती हूँ
खुद में ही
तुमको
तुम्हारे बिन!!! सविता मिश्रा

जनवरी 13, 2017

पुस्तक मेला जनवरी २०१७ - एक रिपोर्ट

यकीं मानिये मेले के नाम से ही हम दस कदम दूर ही रहते थे| जहाँ तक हमें याद कोई भी मेला घूमने की चाहत हमने कभी न की| लेकिन पुस्तक मेला सुनकर इस बार कुछ कुछ हुआ |
पुस्तक मेला घूम आने के कई कारण थे| एक तो अपनी साँझा संग्रहों का विमोचन| दूसरे कई लोगों से मिलकर उनसे मिलें स्नेह-प्यार को सहेज लेने की चाहत| तीसरे अपनों की ख़ुशी में शामिल होना|
कई लोगों से आत्मीयता से मिलना बड़ा अच्छा लगा| कई दिन तक ये सारी यादें बनी रहेंगी| जो आभासी से निकल धरातल पर मिलें वह हमें याद रखे या न रखे किन्तु इस बात की ख़ुशी है कि कई साँझा संग्रह और पत्रिकाओं में हमने अपना नाम दर्ज करा दिये है|
कोई और जाने या न जाने पर किताब में मेरा पड़ोसी अपना देखते समय हमें भी देख ही लेगा, आखिर हम किताब में उसके पड़ोसी जो ठहरे| जैसे हमने 'अपने अपने क्षितिज' में अपना देखते समय आगे सुकेश साहनी भैया को देखे| मेले में भी नजर गयी थी लेकिन देखे से लगते हुए भी हमें पता न चला कि ये लघुकथा के गुरु| पहली लघुकथा वेबसाईट चलाने वाले व्यक्ति हैं| फेसबुक पर न जाने कब निमंत्रण उन्होंने स्वीकार किया यह पता ही न चला| वरना शायद फोटो देखते तो पहचान लेते | अफ़सोस की सामने देखकर भी हम उनसे मिल न पाये|
दिल्ली में सुन रहे थे कि ठण्ड बहुत है, अतः सुबह सबेरे घने कोहरे में जब हम 8 जनवरी को आगरा से लगभग 8:३० बजे चले तो ठंड से बचने के लिए कोटप्रूफ थे| मन में था कि समय से पहुँच पायेंगे भी कि न| कार में बैठे बैठे यह लाइन सूझी --
अभी कोहरा फिर धूप फिर वही घना कोहरा छाया
सूरज की किरणों को घमंडी बादल रोकता ही आया|sm

पर ड्राइवर का हुनर ऐसा कि हम 11:३० के लगभग विमोचन हॉल के पास पहुँच चुके थे| समझ न आते हुए भी बेटे के साथ चलते चल रहे थे कि प्रभाकर भैया को देख लगा अब तो भैया के जरिये ही सही पहुँच जायेंगे क्योंकि पूछने पर पता चला भैया वहीं (वनिका पब्लिकेशन के स्टैंड पर) जा रहें हैं|
बुक फेयर गेट से अंदर आने में तो भूलभुलैया था ही किन्तु अन्दर पहुँचकर और ज्यादा भूलभुलैया हो गया था| शायद आधे घंटे तो लगी गए थे वनिका पब्लिकेशन तक पहुचंने में| आदरणीया नीरज दी बड़े गर्मजोशी से मिलते हुए बोलीं अब सविता आ गयी, अब करते हैं विमोचन| यानि विमोचन न हुआ था तब तक| niraj दीदी इतनी अच्छी इतनी प्यारी की शब्द न अपने पास| मिलकर लगा किसी ख़ास अपनी दी से ही मिल रहे हम|

वैसे हमें इस मेले को अटैंड करके एक बात बड़ी प्रभावित कर रहीं कि हमसे बड़ी उम्र के लोगों की याददाश्त कितनी दुरुस्त है| अब कभी मुलाकात हुई तो पूछेंगे कि भैया किस चक्की का आटा खातें हैं आप लोग| अपनी तो इस उम्र में ही ये हाल कि दरवाजा बंद करके भी निकले तो रास्ते भर यह सोचते रहते कि ताला बंद किया था सही से या न| पर्स में मोबाईल डाल के निकले तो घर आने के बाद भी मोबाईल कभी कभी दुसरे दिन पर्स से निकलता| बिना नाम किसी का लिए नाम कैसे लोग याद रख लेंतें लोग| हम तो दस बार नाम लेके बोलें तो याद रहेगा फिर शायद किसी का नाम|
कौन सबसे पहले मिला यह याद न क्योंकि कई फेसबुक चेहरे सामने देख हम विस्मित से थे| ज्योत्सना या नीता सखी पहले मिलीं शायद| ज्योत्सना ने तो दिन रोशन कर दिया था कॉलगेट के प्रचार से| हँसती- खिलखिलाती हुई रही| नीता सखी तो बहुत ज्यादा हर्षित होकर गले मिली| लगा ही न कि यह पहली मुलाकात| इतनी सरलता अच्छे स्वभाव का परिचायक ही तो है|
असल में फेसबुक पर हम जब आपस में मिलते रहते तो अनजान से न रहते| पोस्ट पढ़के एक दूजे को अच्छे से जान समझ लेते| इसीलिए शायद आभासी दुनिया जब सामने मिली तो पहले विशवास ही न हुआ| लेकिन एक दूजे के गले लगके हम सब ने अपने को शायद अहसास कराया कि हम जमीनी हकीकत में मिल रहें | कल्पना भट्ट दी जो अब तक हमें फालो कर रहीं थीं यह न की जुड़ी होतीं तो हम पहचान भी लेते, लेकिन फिर भी आपसे और महिमा सखी से मिलकर लगा ही न कि यह पहली मुलाकात है| फेसबुक पर भी शायद आमना समाना न हुआ था ज्यादा आप दोनों जन से|
सरलता की मूरत शोभा रस्तोगी सखी, विनय पवार दी जो अब तक हमें दी बोल खुद छोटी बन रहीं थीं, वैसे उम्र ने आपको मात न दी है और मासाल्लाह ताकत और हिम्मत भी आपमें खूब है, भगवान करें बना रहे यह सब| रेणुका चितकारा जो माहिलाओं की टोली की सबसे कम उम्र की प्यारी सी बहन से दूसरी मुलाकात थी|
पहली बार तो कई से मिले, लेकिन फेसबुक पर मुलाकात कई बार कहीं न कहीं हो चुकी थी।

पुस्तक मेला था या मिलन समारोह कहना मुश्किल जरा | अपने आपको ऐसे देख एक बात यह भी सोच रहे कि शायद समय ने हमारे स्वभाव और सिन्धांत में परिवर्तन ले आ दिया है| सही कहतें थें पूर्वज कि समय बड़ा बलवान होता है| वह सब को बदलने की शक्ति रखता है| कभी समय था कि न किसी से मिलते न घर से निकलते थे|😊

वनिका पब्लिकेशन्स पर पहले विमोचन हुआ साझा लघुकथा संकलन 'अपने अपने क्षितिज' का फिर दो लघुकथा संग्रह का विमोचन हुआ| फिर बालकथा की पुस्तक 'कटी पतंग' और 'व्यंग्य बत्तीसी' का विमोचन हुआ| सब के साक्षी रहे हम|






कुल मिला के बरिष्ठो से, जिनसे अब तक कोई बात न हुई उनसे पुस्तक मेले में मिलकर आगे बढ़ या तस्वीर लेने को कहे, ऐसी हिम्मत न हुई जल्दी| लेकिन Ashok Jain भैया जब आगे बढ़ के बोलें तो थोड़ी जिझक खुली, फिर तो जिनसे बात हुई या जो जाने या थोड़ा अनजाने दिखे सब के साथ ली हमने तस्वीर। कह सकते हम कि तस्वीरें भी मिली कईयों के साथ, ढ़ेरों आत्मीयता भी और अच्छा लेखन करने की टिप्स भी। Ashok Bhatia भैया अनिल शूर भैया Subhash Neerav भैया से।
ऐसे साहित्य समारोह में शामिल होते रहे और झिझक खुलती रही। (आदमी धीरे धीरे खुल जाता, यह मानव प्रकृति। )
कुसुम जोशी दी जिन्हें हम चेहरे से खूब पहचान रहे थे बाद में किसी से नाम पूछे तो याद आया कि ग्रुपों में इनसे मुलाकात हुई है अपनी| बड़ी ही शांत, गम्भीर स्वभाव की धनी दी से भी मिलकर बहुत ख़ुशी हुई| अब तो हमने निमंत्रण भेज अपने फेसबुक परिवार में भी शामिल कर लिया है उनको| आ.नीरजा मेहता कमलिनी दी को देखा हमने पर परिचित नही थे अतः हिम्मत ही न हुई कि ऐसे जाके मिलें| सबसे बड़ी बात लगता है क्या परिचय देकर मिलें| वंदना दी जो कई सालों से जुड़ी हैं फेसबुक पर, उनसे भी मुलाकात पहली बार ही हुई| शशी पाण्डेय जिनसे दूसरी मुलाकात पर शायद वह हमें न पहचानी| उनका व्यंग्य हम सुन चुके थे लाइव और साथ में तस्वीर भी ली थी| वहीं प्रवीण कुमार भी दिखे जो पहचाते हुएअपना परिचय दिये | नाम भले न याद था लेकिन शक्ल से हम भी पहचान लिए थे भाई को|
मधु खंडेलवाल दीदी जैसे ही आई हम पहचान लिए क्योंकि उन्होंने अपनी तुरन्त की पिक लगाकर एक पोस्ट डालीं थी| कलछी का स्वादिष्ट प्रसाद बनाकर लायीं थीं| दिल में बसना हो तो पेट से होकर गुजरिये | उन्होंने इस कहावत को अंगीकार कर यह सफ़र बखूबी तय किया|

संदीप तोमर भाई और सतविंदर भाई अकेले खड़े कुछ बिसूर से रहे थें, शायद सोच रहें थे कि ये औरतें कितना बोलतीं हैं| दोनों को देखते ही हम पहचान गये थे| संदीप भाई को पहचानने का कारण था कि हम उन्हें हटा दिये थे | किसी तस्वीर से हम उन्हें गलत जज कर लिए थे| बाद में पता चला की लघुकथाकार तो फिर हमने ही निमंत्रण भेजा|
शब्द मसीहा जी,वीरेन्द्र वीर मेहता भैया, विनय मिश्र भैया से बस आमना सामान हुआ| तीनों जन से हमारी दूसरी मुलाकात थी| बलराम अग्रवाल भैया से भी दूसरी बार मिले थे, बड़े सीधे सहज और सरल व्यक्ति सभी|
मुकेश दुबे भैया जो सुरेश प्रभु महोदय की वजह से देर से पहुँचे लेकिन हम थे की डटे थे विमोचन के लिए| करते भी क्या दोष तो उनका न सही उनके अंडर में चलने वाली ट्रेन का ही सही| वक्तव्य भी उनका उतना ही शानदार जितना कि वो| सुभाष नीरव भैया का भी उसी समय दिया वक्तव्य सुनकर अच्छा लगा| कुछ हुनर भी बताये उन्होंने लिखने के|
वैसे सयानों से यह पता चला भाव हो और शब्दों से खेलने का हुनर मालूम हो तो आदमी कहीं भी झंडे गाड़ सकता|
'खिल उठे पलाश' तथा अंत में झांनवाद्दन का विमोचन हुआ जिसमें हम उपस्थित रहे| प्यार से दो शब्द लिखकर आप दोनों जन की हस्ताक्षरित झाँनवाद्दन और 'खिल उठे पलाश' पाकर ख़ुशी हुई| या कहे पलाश की तरह खिलके वादन कर रहे आप सब के मिलने की ख़ुशी में|


मठरी और मिठाई बांटी गयी| मठरी खाकर बिना पानी के हालत खराब हो गयी| पानी भूल जाना खलने लगा था| कहीं भी जाये पानी लेके जरुर जाये| (सीख भी)
जहाँ चार नारियां मिली जाये वहीँ सभा बैठी जाये| सभा होती रही| इस सभा में विघ्न न हों इस चक्कर में कई जनों से मिलना रह गया पुस्तक मेले में| जबकि सारी नारियाँ धीरे- धीरे सरक लीं|
हम किसी का साथ ले जाने वाले थे कि निर्देश निधि दी ने अपनी पुस्तक विमोचन के लिए रुकने को कहा| विमोचन हुआ वहां एक महिला जो बहुत अच्छा बोल रहीं थी उनका सुनने की कोशिश कर रहे थे पर सुन न पा रहे थे | तभी नीलिमा दी आकर बोली चल घूम आते| उनके साथ वंदना दी के स्टॉल से होते हुए ayan प्रकाशन पर पहुँचे| हमें कंफ्यूजन था कि अनवरत का भी विमोचन होना| पर नहीं सुनकर थोड़ा दुःख हुआ| क्योकि फिर न जा पाते| खैर स्वभाव से सरल भूपी अंकल और वात्सल्यी प्रभा सूद आंटी के साथ तस्वीरें लीं हम दोनों ने| और थोड़ी बात भी की | बात ज्यादा गहराई में जाती इससे पहले हम दी को चलिए कह चल पड़े| वहीँ बलजीत रैना भैया मिलें जो न जाने कैसे पहचान रहें थे हमें| उन्होंने दी और हमारे साथ सेल्फी लीं|
घूम के हम आ गये फिर वनिका ही पर| समारोह हो चूका था| हमने निर्देश दी के साथ तस्वीरें लीं| वहीं उनकी भतीजी प्यारी सी Anupam Ahalavat sis मिलीं| अंजू दी से भी प्यारी सी मुलाकात हुई| जितनी बार नीलिमा दी से उतनी ही बार अंजू दी से मुलाकात हो चुकी| दोनों जन का ही स्वभाव बहुत ज्यादा सरल|

'खिल उठे पलाश' तथा अंत में झांनवाद्दन का विमोचन हुआ जिसमें हम उपस्थित रहे| प्यार से दो शब्द लिखकर आप दोनों जन की हस्ताक्षरित झाँनवाद्दन और 'खिल उठे पलाश' पाकर ख़ुशी हुई|

















































































राकेश भैया से मुलाकात हुई दर्शन तो हमें उनके करने ही थे आखिर देखना था कि गम्भीर शब्द चोर कइसे हो गए😁 बहुत सहज व्यक्ति| लेकिन एक बात पर हंसी ही न रुकी कि वह कोट उतारने के बाद हमें पहचान ही न पाये| जबकि उससे पहले मिलके हम सब तस्वीरें खींचा चुके थे| फिर सोचकर ख़ुशी हुई कि अपने से भी ज्यादा लोग भुल्लकड़ यहाँ| अपनी कटेगरी में उन्हें खड़ा पाकर अपार प्रसन्नता हुई|

अकेले दिशा स्टॉल टाक चले लेकिन भुलभूला गये| रस्ते में एक बात और दिखी मुफ्त में बंटती हुई इसाई धर्म की प्रचार करती पुस्तक | मुफ्त ही सही लेकिन कोई पुस्तक-छोटी डायरी हाथ में आयेगी तो आदमी देखेगा ही हमने भी देखी| हाथ में पकड़ते समय हमें लगा नया नियम नाम से कोई क़ानूनी पुस्तक होगी| यह अच्छी बात जागरूकता फैला रहे मुफ्त बाँट के| किन्तु घर एके देखने पर कुछ और निकला| किसी धर्म का विरोध करने का मकसद न अपना बल्कि हर धर्म में ऐसा हो यह कहना चाह रहे बस|

वैसे जहाँ लोग इस 'नया नियम' को मुफ्त लेने से भी कतरा रहें थे वहीं गीता प्रकाशन की स्टॉल पर खूब भीड़ थी भीड़ में कौन घुसे हमने बाहर से ही देखकर लौट चले|
सुधीर द्विवेदी भाई का सम्मान होता हुआ हमें देखना था| लेकिन हम दिशा स्टॉल खोज ही न पाये| घूमफिर के फिर नीरज दी की स्टॉल के सामने आ गये| दीदी ने हमें देखते ही आवाज लगायीं उनके भतीजे का जन्मदिन था| बड़ा सुशील भतीजा था| उसका जन्मदिन मनाने के बाद हमें वहां ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश भैया दिख गए जिनसे हमने पूछा तो उन्होंने खुद दिशा स्टॉल पर छोड़ने को कहा लेकिन तब तक जीतू भैया और दो जन और थे वह छोड़ने को तैयार हो गयें| थोड़ी सी बात हुई जीतू भैया से| इतने विनम्र इतने सरल विश्वास ही न हो रहा था हमें|
दिशा स्टॉल तक जब तक पहुँचे सम्मान समारोह खत्म हो चूका था| लेकिन वहां पर अनिल शूर भैया और ashok भाटिया भैया ने लघुकथा के बारे में कहा कि खूब पढ़ों| एक हम है कि पढ़ते ही न| किताबें खरीदने में भी कोताही कर जातें| बात कर ही रहे थे कि नजर रामेश्वर भैया पर गयी वह देखते ही पहचान गए न जाने कैसे? आश्चर्य की बात लगी| उनसे भी बातें हुई कुछेक| सादगी से पूर्ण, सरल स्वभाव से धनी भैया से थोड़ी सी बात करना भी सुखद रहा |
मृदुभाषी मधुदीप गुप्ता अंकल द्वारा सम्पादित लघुकथा पड़ाव और पड़ताल 24-२५ खंड भी खरीदी हमने| और Ashok Bhatia भैया द्वारा सम्पादित 'देश-विदेश से कथाएँ' भी |
अपना फोन तो प्राणशून्य हो गया था इस कारण हम बाद में तस्वीरें न ले पाये | दूसरों के फोन से ही कहते रहे कि तस्वीर लो | यहाँ ज्योत्स्ना के फोन से तस्वीरें लीं गयी|
साहित्य कलश की बात उठी तो ये हुआ कि स्टॉल पर जाके ले लीजिये| हम और ज्योत्सना 'साहित्य अमृत' लेने जा रहे थे कि मुकेश भैया मिल गए पुनः| बात हो रही थी कि सुधीर भाई आकर मिले| पहले मिले थे उनके पहचाना कहने पर हम जरा देर से पहचान थे क्योकि उनकी प्रोफाइल में सीधी तस्वीर न लगी थी तिरक्षी थी| | हमने अपने बच्चों से भी सबका परिचय कराया| बात हुई थी ऑटोग्राफ की लेकिन सुधीर से ऑटोग्राफ लेना भूली गए|
सुनीता शानू दी से भी फिर मुलाकात हुई |


अंत में तीन बजे लगभग बच्चों को भूख लगी तो फ़ूड कोर्ट की तरफ जा रहे थे कि श्री सुरेन्द्र शर्मा (हास्य कवि) अंकल से मुलाकात हो गयी तो एक मिनट ठिठके , लेकिन फिर आगे बढ़ तस्वीर लेने की गुजारिश कर दिए। फिर उनका नाम सोचते हुए वहीं खड़े रहे। दुसरे यह भी सोच रहे थे कि ऑटोग्राफ भी ले या न ले, देंगे या न देंगे! लेकिन अपने साँझा लघुकथा संग्रह 'अपने अपने क्षितिज ' पर उनका ऑटोग्राफ ले ही लिए| बाद में डॉली अग्रवाल से पता चला कि उन्होंने उन्हें बुलाया, यानि उनसे मिलना डाली के कारण सम्भव हुआ| अंदर मिलकर बाहर आने पर उम्मीद भी खत्म हो गयी थी कि कोई अब मिलेगा। इसलिए डॉली बहन आप से मिलकर बहुत अच्छा लगा | उम्मीद खत्म होते ही फिर जाग उठती तो लाजमी है न कि दुगुना उत्साह भर उठेगा|

फ़िलहाल जिनसे भी मुलाकात हुई आमना सामना हुआ वह सब फल लदें वृक्ष से थे|

बाद में फ़ूड कोर्ट में जाने पर वहां इतनी भीड़ की न बच्चों की हिम्मत हुई लाइन में लगके कुछ लेने की न अपनी ही| कुर्सी एक दो ही ख़ाली थीं| ख्याल आया कहाँ हुआ हैं नोट बंदी का असर| बाहर निकलते समय भी एक खाने की स्टॉल दिखी वहां भी भीड़ ही भीड़| गजब है अपने भारतीय भी| खाने पहनने में ही बिक जातें हैं|

फ़िलहाल मजा आ गया। सोच रहे इतनी तो आत्मीयता लोगो में फिर घोर कलियुग कैसे आ गया ?
इन सब के लिए किसका शुक्रिया कहेँ! जिनसे पहली मुलाकात में ही इतनी आत्मीयता व प्यार मिला। फेसबुक का शुक्रिया।
यह फेसबुक न होता तो सिर्फ डायरी भरती या शायद न भी भरती। ख़ुशी है कि एक सविता की अपनी छोटी सी ही सही पहचान तो बनी। परिवार, सखी सहेलियों से आगे कोई दुनिया तो दिखी। कभी ख्वाइश ही न की कि जिसे सुन रहे है बचपन से उनसे मिले भी । काहे लिखते, काहे छपते और काहे मिलने की चाहत जागती।
सभी को शामिल किया इस रिपोर्ट में जहाँ तक हमें याद आया |
कुछ लोगों से होते हुए भी न मिल पाना बहुत ही खला| हम पहचान ही न पाये| और कुछ से न आ पाने के कारण| शायद संजोग मिलने का न हो| अगली बार सही |
शुक्रिया वर्ल्ड बुक फेयर:) :)
अंत में एक सलाह भी :)
बुक फेयर भूलभुलैया है| अकेले मत जाइएगा| सलाह के लिए एक साहित्यिक पर्सन का होना जरूरी| एक तो जाने का रास्ता बतायेगा दुसरे आपकी खरीदारी में भी महत्वपूर्ण राय देगा| दोनों में भटकने की गुंजाईश है| मार्गदर्शक का होना सबसे जरूरी|





जितनी तस्वीरें थीं अपने पास सारी ही डाल दी हमने ...:) हम कुछ को नाम से जाने कुछ को शक्ल से पहचाने। आभासी दुनिया से निकल के मिले कई कलम के परवाने।