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मई 29, 2017

muktak-

बस ऐसे ही ..........
राहों से फूल चुन के कांटे बिछा देते है लोग
कदम आगे बढाओ तो जंजीरे डाल देते है लोग
जबान खोलने पर भी लगा दी है पाबंदिया यहाँ
अच्छो अच्छो की सोहबत में बिगड़ जाते है लोग| सविता मिश्रा 
'अक्षजा'

मई 28, 2017

फेसबुकी रस-

इतने !
इतने 😊
इतने गन्दे है हम कि
अच्छे लोग 🐦
पोस्ट पर आते हैं-
समझाने हमको🐰
पर हमारी ही समझ पर
लानत भेज भाग जाते हैं 😉
कहाँ?
कहाँ क्या!
कुछ ब्लाक करके
कुछ ऐसे ही उलटे पाँव
अपने घर को (वाल)!
और कहाँ!!😊
फिर??
फिर क्या !
हम भी मन मार
उन्हें महापागल कहके
संतुष्ट हो लेते।😊
और कुछ ?
कुछ तो
समझा
समझाकर 🐥
समझ के पागल हमे
चुप्पी लगा जाते हैं 
तब ?
तब क्या !
उनकी पोस्ट देखकर
हम भी कुछ
अइसने ही समझ
अनदेखा करके
चुप्पे चले आतें !👻😁
और जो
पोस्ट पर आते वो!
वो
वो क्या समझ आतें ?
राम जाने !
शायद वो
पागल हमको न माने
हम उन्हें पानी पिलाकर ही
अपनी पोस्ट से देते जाने।😊😊
और जो !
सोये पड़े वो ?
उन्हें पानी
पिला पिलाकर
मन करता है
बाहर निकालें !!
क्यों?
क्योंकि
खरबूजे को देखकर ही
खरबूजा रंग बदलता
कुछ मेरे साथ भी
ऐसा ही करतें हैं
फिर हम क्योंकर
न करें!!😛
हम आत्मियता में
फंसे रहतें😊😊
और वो
हमें आँख दिखाते!
हम बर्दाश्त
करें फिर उन्हें
यह हमारी प्रवित्ति
में कहाँ!!😊😊
दिल करता
उन्हें उनकी
औकात दिखला दे😷
भौ भौ करते जो😊
उन्हें आईना
पकड़ा दें!!
#सविता मिश्रा 'अक्षजा'
पुरानी पोस्ट में जरा #नमक लगा के👻👻👻

एक भैया के कहने पर बाद में मिर्च भी छिटके :P

मई 26, 2017

खिल उठे पलाश--mukesh dubeyभैया के 'कहानी संग्रह' की समीक्षा

नाम 'अक्षजा' रखा तो सोचा
कुछ नया सा मैं कर डालूँ

गद्य 'कहानी संग्रह' पढ़कर मैं
   पद्य सी समीक्षा ही लिख डालूँ।





गुबार नहीं है यह। दिल से निकली आवाज है। लेकिन दिल की गहराइयों से में कथाएं पोस्ट करते इस लिए इस को यहाँ ही पोस्ट करना मज़बूरी थी।..:)

कुछ मेरी कलम से---:)  

दस कहानियों में शब्दों की
हुई है सरलता से ऐसी झोकाई
जैसे की कोई जुतें हुए खेत में
बीज बो रहा हो किसान भाई।

पढ़ते-पढ़ते पढ़ डाली थी कब की सारी कहानी
समीक्षा लिखनी थी तो एक बार फिर खंगाली
हतप्रभ थी कथानक की बुनावट देखकर
खाना भी भूली जबकि रोटी रखी थी सेंककर।

मिलकर आपकी विनम्रता तो देखे थे
जाना आपको 'दो शब्द' पढ़कर 
क्या कहानियां बनायी हैं आपने
दादी- नानी के किस्से से बढ़कर।

सामने पहली कहानी थी 'फासले'
'अंशुल', 'शर्मिष्ठा' को देखकर
'शालू' होने का था भ्रम पाले
अंत बड़ा सटीक लिख दिया
'अंशुल' ने अपना दिल-हाले ।

सच्ची प्रेम की महत्ता है आपने दर्शायी
मुझमें आगे पढ़ने की लालसा जाग आयी।

दूजी कथा 'सिद्धार्थ' और 'आरोही' की 'जुगलबन्दी'
पढ़ते-बढ़ते हुई चेहरे की मुस्कान थोड़ी मन्दी
दो दिलो का प्यार टूटकर बिखर रहा था
अंत में 'सिरोही' करके भाई तुसी कमाल कर दी।

'हकीकत' में असलियत की मिली हमको झलकी
'आशिमा' की कहानी पढ़ के भुजा 'अक्षजा'की फड़की
ऐसे 'वैदिकों' की शायद साहित्य में कमी नहीं है
'अशिमाओं' को चाहिए दे 'वैदिकों' को अब पटकी।

'राज' और 'सोमी' की धीरे-धीरे बढ़ती
'सरहदे अपनी अपनी' की लवस्टोरी
पढ़ते हुए यह कथा आँखे मेरी नम हो गयी
किताब रूप में प्यार की बन्द हुई तिजोरी।

'उसके हिस्से का दर्द' शीर्षक पढ़ा तो
सोचा किसके हिस्से में होगा यह दर्द?
पढ़ते ही आज की हकीकत समझ रूह काँप गयी
शक के दानव ने दिल के रिश्ते को किया गर्त।

'यही है सहर'
पत्नी के कहर से टूट चुका था
कि अचानक 'रोहित' को मिली 'गति' शाम के पहर
'गति' ने जो उसके जीवन को दी गति
तो लगा सच में यही तो है असली सहर।

'लिबास' दिल को झकझोरने में सफल हुई
कपड़े-लत्ते पर मानवीय संवेदना भारी पड़ी
यर्थार्थ को परिलिक्षित करा गयी
'श्रेया' कर रही एहसान इस भाव पर अंत में हथौड़ी पड़ी।

'खिल उठे पलाश' में कुछ तो था ख़ास
किताब का नाम यही, तो जगी एक आस
मान्यताओं को इस कहानी में धत्ता बता दिया
'शम्पा'  से दस साल छोटे 'आवि' की शादी करा दिया।

'आंतकवादी' में 'वीरा' की कहानी
आंतक के बीच लड़ती झाँसी की रानी
प्रेमी 'करतार' आतंकवादियों की मंशा करता फेल
'वीरा को कहना उसका करतारा आंतकवादी नहीं था'
अंत के इस वाक्य ने मेरी आँखों से आँसू दिया धकेल।

अंतिम कहानी 'कॉल सेंटर और पूस की रात'
इस कहानी में हुई है युवाओं की बात
बहकते युवाओं में 'अर्पित' की जिम्मेदारी भा गयी
अंत होते-होते आधुनिक पूस की रात छा गयी।

शब्दों के खिलाड़ी ने
खूब खेल दिखाया है
हर कहानी में बड़ी खूबी से
मानवी संवेदना को भर पाया है।

देती हूँ मैं अपने शब्दों को अब यही पर विराम
"खिल उठे पलाश" को पढ़िए आप सब जल्दी हाथ में थाम।


सविता मिश्रा 'अक्षजा'
पढ़ने के बाद लिखने में कल कल होता रहा, कल जल्दी कब आता। इस लिए लिखने में बड़ी देर हो गयी। 

पर कहे थे कि लिखेंगे तो देर आये दुरुस्त आये वाले रास्ते पर चलकर दुबारा पढ़ी गयी कहानियां यह खुशी की भी बात न mukesh dubeyभैया।
बड़े हैं छोटा समझ गलती क्षमा करेंगे उम्मीद है

मई 24, 2017

माँ की रूह -

मृत्यु तो सास्वत सच है जिसे कभी टाला नहीं जा सकता
माँ की रूह को बेटी के शरीर से निकाला नहीं जा सकता |
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

मई 23, 2017

भूली नहीं हूँ-(do line)

 भूली नहीं हूँ कुछ भी मैं दिले नादान से
याद नहीं करना चाहती तुम्हें बस दिमाग से।

||सविता मिश्रा 'अक्षजा'।।

मैं सूर्य नहीं हूँ--

मैं सूर्य नहीं हूँ
सुना न तुमने,
कि मैं सूर्य नहीं हूँ !

सूर्य नहीं हूँ मैं, कि
समय से निकलूँगी और
समय पर ही डूब जाऊँगी।

ऐ बादल, कान खोलकर
जरा तू भी सुन ले कि
मैं वह सूर्य नहीं हूँ
जिसे तू अपने पीछे
छुपा लेता है।

मेरे नाम का अर्थ
भले ही सूर्य हो,
पर सूर्य नहीं हूँ मैं।

महाभारत काल का
सूर्य भी नहीं हूँ मैं कि
जिसके सामने उसके
पुत्र कर्ण का कवच कुंडल
छीन लिया जाय कपट से।

मैं सतयुग का भी
सूर्य नहीं हूँ
जिसे फल समझकर
भक्षण करने का
प्रयास किया जाय।

मैं कलयुग की सविता हूँ,
वर्तमान का सूर्य हूँ मैं,
न तेरे कहने से निकलूँगी,
न तेरे कहने पर चलूँगी,
और न तेरे कहे अनुसार
अपना आचरण करुँगी।

द्वापर युग के सूर्य की तरह
बेटे के साथ छल भी नहीं होने दूँगी
और न ही सूर्य की तरह
अपने कुरूप हुए बेटे को
अपने आप से जुदा ही करुँगी
मैं छाया हूँ उसमें जोश भरूँगी
दुनिया उसके कार्य से
उसे पहचानेगी एक दिन।

छली कपटी लोगों
सुन लो कान खोलकर
मेरे बच्चों की तरफ
गलती से भी कभी
तिरक्षी दृष्टि न करना।

मैं सूर्य नहीं हूँ,
मैं शक्तिस्वरूपा हूँ
अपने बच्चों की
'छाया' हूँ मैं।

एक माँ हूँ मैं,
एक नारी हूँ मैं
अडिग हो गई तो
सब पर भारी हूँ।

सूर्य नहीं हूँ बल्कि,
सविता हूँ मैं |
************************

#सविता मिश्रा #अक्षजा

मई 19, 2017

निर्भया का खत अपनी माँ के नाम -

प्यारी माँ ,
सादर नमस्ते
माँ मैं यहाँ स्वर्ग लोक में बहुत खुश हूँ । यहाँ मुझको छेड़ना छोड़ो बेअदवी से भी कोई बात न करता । सब इतने अदब से पेश आते कि कभी- कभी मैं उकता जाती हूँ ! और गुज़ारिश करती हूँ कि मुझे फिर मेरे घर भेज दें, पर यहाँ के सर्वेसर्वा कहतें हैं कि अभी समय नहीं आया कि तुम्हें भारत भेजा जा सकें।
माँ जब मैंने ऐसा कई बार कहा और उनका रटा-रटाया जबाब कि 'अभी समय नहीं आया' सुनकर तो मेरे अंदर का जासूस जाग गया । बिना एक पल गवाएं मैं खबर लेने लग पड़ी , तो मैंने देखा कि मेरी सुरक्षा को लेकर ये सब कितने सतर्क हैं । ये सब कह रहें थे कि अभी ऐसा कुछ भी भारत में नहीं हुआ हैं जिससे मेरी सुरक्षा पुख़्ता हो सकें , बल्कि ये सब कह रहें हैं कि स्थिति और भी बिगड़ गयीं हैं। लोग उन्मादी हो गए हैं, अपने को कामदेव भी समझने लग गए हैं। लड़कियां छोड़ो कन्याओं को भी फ़ूल की तरह मसल दें रहें हैं। मानवता जैसे समाप्ति की ओर है। राक्षसी शक्तियाँ प्रबल हो गयी हैं। ज्यादातर मानव राक्षसी प्रभाव में आ गए हैं।

कुछ लोग जो प्रभाव से दूर थे उन्होंने मौन धारण कर लिया है। उनका मौन धारण करना और भी घातक होता जा रहा है। कुछ प्रभावित लोग डर के प्रभाव से बाहर निकलते ही हो-हल्ला करतें हैं पर फिर उन पर अंधेरा प्रभावी होने लगता है। अपनी छवि चमकाने की दूकान चलते- चलते अचानक जैसे बन्द हो जाती है। सब के सब दूसरें दिन अखबार में अपनी-अपनी तस्वीर देख खुश हो जाते हैं। माँ असल में मेरी तो किसी को न पड़ी थी और न किसी और लड़की की पड़ी है।

माँ जब तक मार्तिशक्ति नहीं जागेंगी कुछ ना हो सकेंगा। माँ तुम भी आश्वासन पाकर शांत हो गई। मैं देख रहीं हूँ, तुमने अपनी आवाज़ बुलंद न की। जानती हूँ छुटकी के कारण तुम चुप रह गयीं, पर माँ डर-डर कर जीने से तो अच्छा है मर जाओ ना शान से ।

बड़ा छलावा हैं वहां। क्योँकि यहाँ आने पर मैं सब देख पा रहीं हूँ। सब स्वस्वार्थ से एक दूजे से बंधे हैं। कोई अपनों के लिए बोलता है, कोई चुप हो जाता हैँ। माँ आखिर कब तक सब लोग, सब के लिए बोलते नजर आएंगे बिना किसी स्वार्थ के। बताओं तो माँ?

 ऊहह नहीं जानती तू भी ना। मैं भी ना, किससे पूछ रही हूँ। पर माँ एक बात सुन मेरी और मान। मातृशक्ति को जगा , सहना नहीं लड़कियों को दुष्टो से लड़ना सीखा। जब सब झुण्ड के झुण्ड एक साथ खड़ी हो जायँगी गलत के ख़िलाफ़ तो मेरी जैसी हालत न होगी माँ।

माँ बहुत दर्द दिया जिंदगी ने पर माँ अब मैं बहुत खुश हूँ। तू मेरी चिंता करके मत रोया कर। तेरे आंसू तड़प कर बहते है तो मुझे भी रोना आता है । मेरे आंसू पर यहाँ सब परेशान हो जाते हैं| पापा, भैया और छुटकी का ख्याल रखना। पापा भी छुप-छुपकर रोते हैं, उन्हें अकेला मत छोड़ा कर।
अच्छा माँ अब विदा फिर मिलूंगी, जब तू चाहेंगी ,मुझे याद कर रोएंगी तो अपने ही आसपास मुझे पाएंगी। लव यू माँ ...। 
तेरी सिर्फ तेरी 

निर्भया

मई 16, 2017

मेरी बिटिया बड़ी नाजो से पली-

मेरी बिटिया बड़ी नाजो से है पली
इतने लोगों की रसोई उससे कैसे बनी।|
सास-ननद चलाती हैं हुक्म दिनभर
बिटिया तू क्यों रहती है यूँ सहकर
करती नहीं ननद जरा सा भी काम
भाभी को वह समझती है एक गुलाम।
मेरी बिटिया बड़ी नाजो से है पली
संयुक्त परिवार में उसकी कैसे निभी।।
दिन-दिन भर वह खटती रहती
दर्द सहकर भी कभी कुछ न कहती
हाथ नाज़ुक हो गए उसके कितने ख़राब
पैरों की बिवाई वह छुपाती पहन जुराब |
मेरी बिटिया फूलों सी कोमल बड़ी
सूख के देखो कैसे अब कांटा हुई ||
रिश्तों की बांधे हाथों में हथकड़ी
हर काम को फिर भी तत्पर खड़ी
खेलने-खाने की उम्र में ब्याही गयी
ससुराल में कभी भी न सराही गयी
चैन से जीना वहां उसका हुआ हराम
क्या मज़ाल कि पल भर को मिले आराम।
मेरी बिटिया बड़ी नाजो से है पली
हर क्षण दिखे खिलखिलाती ही भली ||
कभी चेहरे पर उसके कोई भी सिकन न दिखी
विधना ने न जाने उसकी कैसी तक़दीर लिखी।।
मेरी बिटिया बड़े ही नाजो से पली
दिल देखो जीतने सबका वह चली …।।

मई 14, 2017

नर सदा तेरा आभारी है -

महिला दिवस की ढेरों शुभ कामनाएं..........

नारी तू संस्कारित नारी है 
नर सदा तेरा आभारी है 
कहें न मुख से भले ही
यह उसकी लाचारी है

अहम उसका भारी है
आत्मा तो फिर भी जानी है
नारी तू सुकोमल नारी है
नर के बीच तू जानी मानी है
दिल 
उसका सदा करता बेईमानी है
मुख बोले न उसके इसकी हैरानी है

नहीं करता तेरा गुणगान
यह उसकी नादानी है
कैसे कर दे यह कर्म वह
क्योंकि बहुत ही अभिमानी है

बोले कोई नर या ना बोले पर
नारी तू सदा नर पर भारी है
नारी तू आदरणीय नारी है
नर सदा तेरा आभारी है
नारी तू जग में सबसे प्यारी है
नर सदा तुझपर ही तारी है |


सविता मिश्रा 
'अक्षजा'

मई 09, 2017

आत्म संतोष-


सिर उनके कंधे पर रख
कह के उनसे अपने गम

लहरों की तरह 
बहने लग गये मेरे आँसू
आँसुओ में बह गये
मेरे सारे गिले-सिकवे
गिले -सिकवे कर
भूल गये हम
अपने सारे ही गम
गम भूल मिल गयी
कुछ खुशी हमें
खुशी पाकर भूल गये
स्वयं को ही हम ||#सविता

मई 07, 2017

फर्ज का दर्द -


महगें से महंगा बस्ता और
किताब-कापी हजारो में खरीदवाई !!

फिर स्कूल ड्रेस, जूतें, टाई
इस मंहगाई में तुम्हारें लिए बनवाई |

रिक्शा में तकलीफ होगी तुमको
हजारों में बस भी लगवाई !
स्कूल फ़ीस भरने में तो
नानी ही याद हमको आई |

ट्यूशन की तो पूछो नहीं
हर एक विषय लगवाते है
फिर भी तुम्हारें नंबर
इम्तहान में कम क्यों आते है?

ऊपर से रोज तुम्हें !
कुछ ना कुछ
रुपयें भी चाहिए होते है !!

परफ्यूम की बोतल भी
दस दिन में ख़त्म करते हो !
फिर भी पढ़कर जब
स्कूल से घर को आते हो
सब कुछ फेंक इधर-उधर
कुछ कहनें पर अहसान सा जताते हो |

पढ़कर जैसे हम पर ही
अहसान कर रहे हो
यह नहीं जानते मेहनत न करके
अपनी ही पैरो पर कुल्हाड़ी मार रहे हो |

मेहनत से पढ़ जब
कुछ बन जाओगें
तभी अच्छी सी
दुल्हन भी पोओगें |

हो सकता है तब यह माँ-बाप याद ना आयें तुमको
काट-काट पेट, पढाया है जिसने इतना तुमको |
'वाद- विवाद' कर, बिना हिचके यह कह जाओगें
पढ़ाकर, अहसान नहीं किया फर्ज था जो निभाया |

हमारा तो फर्ज था
हमने निभा दिया उसको
तुम ही शायद अपना फर्ज भूल गये,
याद रखना था जिसको |..सविता मिश्रा
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मई 03, 2017

पुण्य-

बूढ़े बच्चे एक समान
करो सेवा उनकी बारम्बार
बूढ़ों के प्रति है अगर सम्मान 
तो बच्चों में बसते हैं भगवान |

बूढ़े-बच्चे की सेवा कर 
बढ़ाओ अपने पुन्य कर 
बूढ़ा देगा आशीर्वाद तुम्हें 
तो बच्चा देगा आदर तुम्हें |

बूढों का आदर कर 
सुकून अपार पाओगें
बच्चों में स्वयं भगवान
की झलक देख इतराओगें |

सेवा से मिले शांति 
सेवा से ही मिले भक्ति 
सेवा में ही अपार शक्ति 
सेवा से ही आती कान्ति |

सेवा करके सबका 
हो जाओ सबके मन का
पुन्य कर लो तुम इह लोक 
सवांर लो अपना परलोक |

|| सविता मिश्रा ||
अप्रैल १९८९
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